तान्हा (लकड़ी का बैल) पोला के 237 वर्ष पूर्ण: नागपुर के भोंसले राजघराने में है सबसे बड़ा 8 फीट का लकड़ी का बैल
नागपुर | ऐतिहासिक धरोहर एवं लोक-संस्कृति
नागपुर शहर में मुख्य पोला पर्व के अगले दिन 'तान्हा पोला' मनाने की अनूठी और ऐतिहासिक परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस वर्ष लकड़ी के बैलों के इस महापर्व (तान्हा पोला) को 237 वर्ष पूरे हो रहे हैं। भारत एक कृषि-प्रधान देश है और देश भर में पोला का त्योहार बैलों के प्रति आभार व सम्मान प्रकट करने के लिए मनाया जाता है।
पोला के दूसरे दिन यानी तान्हा पोला पर नन्हे बच्चे लकड़ी के बैलों को सजाकर उत्सव मनाते हैं। विदर्भ के अलावा यह अनूठा पर्व देश में अन्य कहीं नहीं मनाया जाता, जो इसे बेहद खास बनाता है।
सन 1789 में श्रीमंत राजे रघूजी महाराज भोंसले (द्वितीय) ने की थी शुरुआत
बालगोपालों को बाल्यावस्था से ही कृषि संस्कृति, गोवंश और बैलों के महत्व का बोध हो, इसी उद्देश्य से सन 1789 में श्रीमंत राजे रघूजी महाराज भोंसले (द्वितीय) ने लकड़ी के बैल (तान्हा पोला) की शुरुआत की थी।
उस समय राजे रघूजी महाराज ने विशेष रूप से कारीगरों से लकड़ी के बैल बनवाए और नगर के सभी छोटे बच्चों में बंटवाए थे।
सजीव बैलों की तरह श्रृंगार और हनुमान खिड़की के दर्शन
इन लकड़ी के बैलों को जीवित बैलों की तरह ही आकर्षक रंगों, झूल और आभूषणों से सजाया जाता है। आम के पत्तों का तोरण लगाकर उसमें जलेबी, फल और आधुनिक दौर में चॉकलेट व बिस्कुट के पैकेट बांधे जाते हैं। तोरण के नीचे बच्चों को खड़ा कर बैलों की विधिवत आरती और पूजा की जाती है।
पूजा संपन्न होते ही तोरण तोड़कर (पोला फोड़कर) गाजे-बाजे और ढोल-ताशों के साथ 'हनुमान खिड़की' के दर्शन हेतु शोभायात्रा निकलती है। वहां श्री हनुमान जी को नारियल अर्पित कर लौटने के बाद बच्चों को स्वादिष्ट पकवान, मिठाइयां और पैसे (नेग) बांटे जाते हैं।
विदर्भ का सबसे बड़ा लकड़ी का बैल: भोंसले राजघराने की अनमोल धरोहर
🎺 11 सितंबर 2026 को निकलेगी भव्य शोभायात्रा
श्रीमंत राजे रघूजी महाराज भोंसले (द्वितीय) के समय जिस शान-ओ-शौकत से शोभायात्रा निकाली जाती थी, उसी परंपरा का पालन करते हुए इस वर्ष भी 11 सितंबर 2026 को शाम 5:00 बजे विशाल शोभायात्रा निकाली जाएगी।
